वंदे मातरम् पर ऐतिहासिक बहस पुरा पढें

 इतिहास, राजनीति और वंदे मातरम् की गूँज


लोकसभा के एक सत्र के दौरान वंदे मातरम् से जुड़ी ऐतिहासिक बहस एक बार फिर सुर्खियों में आ गई। राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत पर होने वाली चर्चाएँ हमेशा से भारतीय राजनीति और समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखती रही हैं। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन का दौर रहा हो या आधुनिक राजनीतिक संवाद—वंदे मातरम् को लेकर अलग-अलग धड़ों के मत, विचार और ऐतिहासिक तर्क लगातार बहस पैदा करते रहे हैं।


संसद में हुई इसी बहस के दौरान ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया गया, विशेषकर 1937 की कांग्रेस वर्किंग कमिटी का वह निर्णय, जिसमें तय हुआ था कि हर राष्ट्रीय सभा की शुरुआत में वंदे मातरम् गाया जाएगा। इस निर्णय के बाद क्या हुआ? क्यों मुस्लिम लीग ने इस पर आपत्ति जताई? मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की भूमिका क्या थी? हिंदू महासभा ने भी क्यों विरोध जताया?


इन सब सवालों के जवाबों ने एक बार फिर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के कई भूले हुए अध्यायों को सामने ला दिया है।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

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भाग 1: वंदे मातरम्—एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


वंदे मातरम् का इतिहास बंगाल विभाजन (1905) के आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तमाम सभाओं, आंदोलनों और जन-प्रदर्शनों में इसे गाया जाता था।


यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक प्रेरणा था


तमाम क्रांतिकारी संगठनों ने इसे अपने आंदोलन का “वार क्राई” बनाया


ब्रिटिश सरकार ने कई समय तक इसे गाने पर रोक तक लगाने की कोशिश की



लेकिन समय बीतने के साथ ही गीत के कुछ हिस्सों पर धार्मिक आपत्तियाँ उठने लगीं। विशेषकर मुस्लिम लीग ने यह माना कि गीत के कुछ हिस्से उन्हें धार्मिक रूप से असहज करते हैं।



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भाग 2: मुस्लिम लीग की भूमिका और विरोध


इतिहास के मुताबिक, मुस्लिम लीग के कई नेताओं ने वंदे मातरम् के उन हिस्सों पर आपत्ति जताई जो देवी-देवताओं के स्वरूपों की वंदना करते हैं। उनका तर्क था कि धार्मिक विविधता वाले देश में ऐसा गीत सबके लिए एक “समान राष्ट्रीय गीत” नहीं हो सकता।


मुस्लिम लीग के कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि ऐसे गीत का अनिवार्य उपयोग उन्हें महसूस कराता है कि राष्ट्रवाद को धार्मिक प्रतीकों के साथ जोड़ा जा रहा है, जो उनके लिए स्वीकार्य नहीं।


यही वह पृष्ठभूमि थी जहां पहली बार यह मांग उठी कि वंदे मातरम् का बहिष्कार होना चाहिए।



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भाग 3: कांग्रेस और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद—विरोध के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का दृष्टिकोण इस विवाद में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। कांग्रेस के भीतर भी बड़ी संख्या में मुस्लिम सदस्य और नेता थे, लेकिन आज़ाद ने स्पष्ट कहा:


“वंदे मातरम् में कोई आपत्ति नहीं है।”


मौलाना आज़ाद का मानना था कि गीत के राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थों को धार्मिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके लिए यह राष्ट्रभक्ति और मातृभूमि के सम्मान का प्रतीक था।


उनके इस रुख ने कांग्रेस के भीतर एक मजबूत विचारधारा को जन्म दिया—एक ऐसी विचारधारा जो बहुलतावाद, राष्ट्रीयता और एकता का पक्ष लेती थी।



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भाग 4: 1937 का ऐतिहासिक निर्णय—कांग्रेस वर्किंग कमिटी का फैसला


1937 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। उस समय भारत में चुनाव और प्रदेश सरकारें बनने लगी थीं। कांग्रेस की भूमिका पहले से अधिक मजबूत और व्यापक हो चुकी थी।


मुख्य मुद्दा था:


क्या राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् गाया जाना चाहिए?


मुस्लिम लीग सहित कई धड़ों के दबाव के बावजूद, कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया:


“जहाँ भी नेशनल गैदरिंग होगी, उसकी शुरुआत वंदे मातरम् से की जाएगी।”


यह निर्णय एक तरह से गीत को राष्ट्र के राजनीतिक और सांस्कृतिक ढाँचे में आधिकारिक स्थान देने जैसा था।



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भाग 5: 1937 के निर्णय का बड़े पैमाने पर विरोध


इस निर्णय के बाद कई प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।


► मुस्लिम लीग ने विरोध किया


उनका मानना था कि यह निर्णय धार्मिक आधार पर बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है।


► हिंदू महासभा ने क्यों विरोध किया?


इतिहासकार बताते हैं कि हिंदू महासभा का विरोध भी दिलचस्प था। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के सिर्फ पहले हिस्से को ही अपनाया जा रहा है, जबकि पूरा गीत स्वीकार किया जाना चाहिए था।

दो अलग-अलग विचारधाराओं ने अलग-अलग कारणों से इस निर्णय पर आपत्ति जताई।


इस तरह, 1937 का निर्णय एक “ट्रिपल कॉन्ट्रोवर्सी” बन गया —


1. कांग्रेस बनाम मुस्लिम लीग



2. कांग्रेस बनाम हिंदू महासभा



3. मुस्लिम लीग बनाम राष्ट्रवादी दृष्टिकोण





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भाग 6: संसद में आज की बहस—क्यों फिर उठा यह मुद्दा?


हाल के लोकसभा सत्र में जब यह विषय उठा, तब एक सांसद ने 1937 की पूरी ऐतिहासिक प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि मुसलिम लीग ने हमेशा वंदे मातरम् का विरोध किया, जबकि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने इसे समर्थन दिया।


सांसद ने कहा:


“यह फर्क है—कांग्रेस के मौलाना आज़ाद और मुस्लिम लीग के जिद्दा के बीच।”


इस बयान के साथ कई ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला भी दिया गया। सांसद ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी वंदे मातरम् को साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास हुआ था, लेकिन राष्ट्रवाद की मुख्यधारा ने हमेशा इसे स्वीकार किया।



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भाग 7: संसद का दृश्य (इमेज का वर्णन)


इमेज में दिख रहा दृश्य लोकसभा का है, जहाँ कुछ सदस्य अपनी सीटों पर बैठे ध्यानपूर्वक चर्चा सुनते दिखाई दे रहे हैं।


बैकग्राउंड में ‘Sansad TV’ का लाइव प्रसारण लोगो दिख रहा है।


एक सदस्य हेडफोन लगाए हुए नजर आ रहा है।


स्पीकर की सीट पर “IN THE CHAIR: JAGDAMBIA PAL” लिखा हुआ है।


टेबल पर दस्तावेज़, माइक्रोफोन और सामान्य संसदीय सेटअप साफ दिखता है।



पूरा दृश्य इस बात को दिखाता है कि यह चर्चा औपचारिक और गंभीर प्रकृति की है, और संसद इसे महत्वपूर्ण तरीके से सुन रही है।



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भाग 8: वंदे मातरम्—आज के भारत में इसकी संवैधानिक स्थिति


महत्वपूर्ण तथ्य:


वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है, जबकि जन गण मन राष्ट्रीय गान।


संविधान सभा में इस पर लंबी बहस हुई।


24 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता मिली।


मौलाना आज़ाद सहित कई नेताओं ने इसे ससम्मान स्वीकार किया।



आज भी वंदे मातरम् भारत की एकता, संस्कृति और इतिहास का प्रतीक है।



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भाग 9: राजनीतिक दलों की वर्तमान प्रतिक्रिया


हालांकि यह बहस ऐतिहासिक है, लेकिन आज की राजनीति में भी इसका असर साफ दिखाई देता है।


कुछ दल इसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बताकर इसका समर्थन करते हैं।


कुछ इसे धार्मिक आधार पर विभाजनकारी बताते हैं।



लेकिन संसद में उठी बहस ने स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व का विषय है।



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भाग 10: निष्कर्ष—अतीत से सीख और वर्तमान में संवाद की जरूरत


वंदे मातरम् पर बहस कोई नई बात नहीं। 1905 से लेकर 1937 और 2025 तक यह विषय भारतीय राजनीति में अलग-अलग दृष्टिकोणों से उभरता रहा है। संसद में उठी हालिया बहस ने यह साबित किया कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्व हमेशा समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन की मांग करता है।


लोकसभा में हुई इस चर्चा ने इतिहास की उन परतों को खोला है जो हमें यह सिखाती हैं कि:


राष्ट्रवाद का अर्थ किसी एक समुदाय के दृष्टिकोण से परिभाषित नहीं हो सकता


ऐतिहासिक निर्णय सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक आधार रखते हैं


वंदे मातरम् सिर्फ गीत नहीं, बल्कि भारत के स्व

तंत्रता संग्राम की धड़कन है



आज के भारत में जरूरत है कि इस गीत को उसके वास्तविक स्वरूप—राष्ट्र के प्रति सम्मान, सांस्कृतिक एकता और ऐतिहासिक विरासत—के रूप में देखा जाए।




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