मथुरा में नकली DEW फैक्ट्री का भंडाफोड़

 भूमिका — डर के आगे मौत! नकली कोल्ड ड्रिंक का बड़ा नेटवर्क उजागर


“डर के आगे जीत है”—यह स्लोगन देशभर में प्रसिद्ध है, लेकिन मथुरा में जो खुलासा हुआ, उसने इस लाइन को नया अर्थ दे दिया है। अब लोग कह रहे हैं—‘डर के आगे मौत है’, क्योंकि यहां जिस नकली DEW (माउंटेन ड्यू जैसी दिखने वाली नकली कोल्ड ड्रिंक) का उत्पादन हो रहा था, उसमें जीत नहीं, बल्कि बीमारी, जहर और जान जाने का खतरा छिपा था।


उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग ने एक लंबे समय से चल रही नकली कोल्ड ड्रिंक निर्माण फैक्ट्री पर जब छापा मारा, तो पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया। जगह-जगह रखी हरी बोतलें, प्लास्टिक की पैकिंग, बिना लेबल के कनस्तर, तेज़ रासायनिक गंध और गंदा पानी—ये सब देखकर अधिकारी भी स्तब्ध रह गए।


जांच में पता चला कि यह पूरी फैक्ट्री नाले के पानी, घटिया केमिकल, और निम्न दर्जे के फ्लेवर को मिलाकर नकली DEW तैयार कर रही थी। यह ड्रिंक बेहद कम कीमत पर बाज़ार के दुकानदारों तक पहुँचती थी और असली ब्रांड की तरह ही बेची जाती थी। लोगों की सेहत किस खतरे में थी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।


इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी इतनी कमजोर है? क्या प्रशासन नियमित रूप से बाज़ार में बिकने वाले ऐसे ड्रिंक्स का परीक्षण नहीं करता? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ब्रांड कंपनियों का ट्रैकिंग सिस्टम इतना कमजोर है कि उनकी असली बोतलों की जगह नकली माल आसानी से घूमता रहे?


मथुरा में नकली DEW फैक्ट्री का भंडाफोड़

https://fktr.in/mNaowqF

इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द यह विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है।



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1. छापेमारी की पूरी कहानी — कैसे चला ऑपरेशन?


खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम को कई दिनों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि मथुरा के बाहरी इलाके में बड़ी मात्रा में नकली कोल्ड ड्रिंक तैयार की जा रही है। स्थानीय लोगों ने गाड़ियों की आवाजाही, बोतलें लाने–ले जाने और रात में बढ़ती गतिविधियों की सूचना दी थी।


सूचना पुख्ता होने के बाद टीम ने अचानक छापा मारा। जैसे ही अधिकारी अंदर पहुंचे, एक दृश्य ऐसा दिखा मानो किसी बड़े कारखाने में कोल्ड ड्रिंक का ‘व्यवसायिक’ उत्पादन हो रहा हो।


फैक्ट्री में—


दर्जनों कंटेनर भरे हुए थे


पानी नाले से पंप कर टैंक में चढ़ाया जा रहा था


रासायनिक बोतलें किनारे पड़ी थीं


प्लास्टिक की हरी बोतलों के ढेर लगे थे


मशीनें तेज़ी से बोतलों में तरल भर रही थीं



सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि सारा काम बिना किसी लाइसेंस, गुणवत्ता नियंत्रण या खाद्य सुरक्षा मानदंडों के चल रहा था।



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2. नकली DEW की तैयारी — नाला, केमिकल और मिलावट का घिनौना सच


जब टीम ने उत्पादन प्रक्रिया का निरीक्षण किया, तो कई खतरनाक तथ्य सामने आए:


➤ किस पानी का इस्तेमाल हो रहा था?


फैक्ट्री के पीछे एक खुला नाला था। वहीं से पाइप डालकर पानी टैंक में भरा जा रहा था। यह पानी—


मटमैला


बदबूदार


बैक्टीरिया-युक्त


पूरी तरह अस्वच्छ



था।


इसे बिना किसी फिल्ट्रेशन या प्रोसेसिंग के सीधे कोल्ड ड्रिंक बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।


➤ मिश्रण में कौन-कौन से केमिकल मिलाए जा रहे थे?


कई केमिकल के डिब्बे मिले जिन पर—


कोई लेबल नहीं


कोई सुरक्षा जानकारी नहीं


न ही यह पता कि वे फूड-ग्रेड हैं या नहीं



निरीक्षण से अनुमान है कि इनमें कृत्रिम फ्लेवर, कृत्रिम रंग, एसिडिटी रेगुलेटर और चीनी का विकल्प शामिल था। अधिकतर ऐसे पदार्थ औद्योगिक उपयोग के होते हैं, न कि मानव उपभोग के।


➤ बोतलें और पैकिंग


बोतलें बेहद घटिया गुणवत्ता की थीं। कुछ बोतलें इतनी पतली थीं कि हाथ से दबाने पर मुड़ जाती थीं।

लेबल्स भी नकली थे और मशहूर ब्रांड के समान दिखने के लिए बनाए गए थे।



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3. कई महीनों से चल रही फैक्ट्री — प्रशासन की नींद क्यों टूटी?


सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह फैक्ट्री महीनों से चल रही थी, तो खाद्य सुरक्षा विभाग ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की?


स्थानीय लोगों के अनुसार—


कई बार ट्रक और छोटे वाहन बोतलों के पैकेट लेकर जाते थे


फैक्ट्री रात में ज़्यादा सक्रिय रहती थी


गंध से आसपास रहने वाले परेशान थे



फिर भी संबंधित विभागों को भनक क्यों नहीं लगी?


संभावित कारण:


1. निगरानी की कमी

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे अवैध यूनिट आसानी से चल जाते हैं क्योंकि निरीक्षण टीम नियमित रूप से नहीं पहुंचती।



2. शिकायतों की उपेक्षा

कुछ लोगों का दावा है कि पहले भी शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।



3. मुनाफाखोरी का बड़ा खेल

कई छोटे दुकानदार बेहद सस्ते दाम पर यह नकली ड्रिंक खरीदते थे। इसकी मांग तेजी से बढ़ रही थी।





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4. FSSAI और जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल


यह बात भी सामने आई है कि बाज़ार में बिकने वाले कोल्ड ड्रिंक की नियमित सैंपलिंग नहीं हो रही थी।

जब FSSAI और जिला प्रशासन की टीमें समय-समय पर जांच नहीं करेंगी, तो ऐसे नकली उत्पाद आसानी से फैलेंगे।


महत्वपूर्ण प्रश्न —


क्या बच्चों और आम लोगों की सेहत की कोई कीमत नहीं?


क्या इतने बड़े पैमाने पर मिलावट का पता लगाना कठिन था?


क्या विभाग संसाधनों की कमी से जूझ रहा है या लापरवाही है?




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5. कितनी दुकानों तक पहुंच चुका था यह जहरीला उत्पाद?


छापेमारी के बाद जांच में पाया गया कि—


आसपास के 40 से अधिक दुकानों में यह नकली ड्रिंक बेची जा रही थी


कई दुकानदारों ने बताया कि वे इसे असली ब्रांड से सस्ता पाते थे


लोगों ने बिना शक किए इसे खरीद लिया क्योंकि बोतलें देखने में असली जैसी लगती थीं



यह भी संभावना है कि यह सामान मथुरा के अलावा पड़ोसी जिलों तक भी पहुंच रहा था।



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6. क्या किसी को नुकसान पहुंचा?


स्थानीय लोगों ने बताया कि कई बार इस पेय को पीने के बाद—


पेट दर्द


उल्टी


दस्त


सिरदर्द



जैसी समस्याएं हुईं, लेकिन किसी ने यह सोचा भी नहीं कि वजह नकली कोल्ड ड्रिंक हो सकती है।



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7. ब्रांड कंपनियों का ट्रैकिंग सिस्टम क्यों फेल हुआ?


आज कई कंपनियां अपने उत्पादों पर—


QR कोड


बैच नंबर


सीरियल कोड



का इस्तेमाल करती हैं।

फिर भी ऐसा नकली माल बाज़ार में घूमता रहा, यह सवाल ब्रांड्स की कार्यप्रणाली पर भी खड़ा करता है।


क्यों फेल हो जाता है ट्रैकिंग सिस्टम?


छोटे बाजारों में निगरानी कम


डिस्ट्रीब्यूटर्स की गतिविधियों पर कंट्रोल नहीं


रिटेल दुकानों पर चेकिंग न होना




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8. फैक्ट्री मालिकों पर कौन सी धाराएं लगेंगी?


जांच में यह पाया गया कि फैक्ट्री—


बिना लाइसेंस


बिना टेस्टिंग


बिना अनुमति


सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरे में डालते हुए



चलाई जा रही थी।


इस पर इन धाराओं में कार्रवाई संभव है:


IPC 272 (मिलावटी खाद्य पदार्थ)


IPC 273 (हानिकारक खाद्य पदार्थ की बिक्री)


FSSAI Act 2006 की विभिन्न धाराएं


कॉपीराइट/ट्रेडमार्क उल्लंघन



गिरफ्तारी होगी या सिर्फ “नोटिस जारी” कर मामला ढक दिया जाएगा—यह अभी सबसे बड़ा सवाल है।



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9. छापे की तस्वीरों में क्या दिखता है? (इमेज विवरण)


फोटो में कुछ लोग हरे रंग की कोल्ड ड्रिंक की बोतलों के पैकेटों को ढेर में रखे हुए हैं।

कुछ लोग इन्हें उठा रहे हैं, जबकि कुछ निरीक्षण करते नजर आ रहे हैं।

यह एक गोदाम जैसा स्थान लगता है जहां बड़ी मात्रा में बोतलें स्टैक की गई हैं।



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10. आम लोगों के लिए चेतावनी — कैसे पहचानें नकली उत्पाद?


बेहद सस्ता दाम → नकली होने की संभावना


बोतल की गुणवत्ता खराब हो


लेबल पर प्रिंट धुंधला हो


ढक्कन आसानी से खुल जाए


QR कोड या बैच नंबर मौजूद न हो



ऐसे उत्पाद तुरंत वापस कर दें और शिकायत करें।



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11. विशेषज्ञों की राय — सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा


डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे पेय पदार्थों में—


बैक्टीरिया


जहरीले रसायन


अम्ल


दूषित पानी



हो सकता है, जिससे गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं, जैसे—


किडनी डैमेज


पेट का संक्रमण


फूड पॉइजनिंग


आंतों में सूजन


लिवर डैमेज




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12. आगे की कार्रवाई — क्या होगा?


सभी सैंपल लैब भेजे गए हैं


दुकानदारों से पूछताछ जारी है


सप्लाई चैन की जांच होगी


फैक्ट्री मालिकों की पहचान की जा रही है



अगर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केस एक और मिलावटकांड बनकर रह जा

एगा।



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निष्कर्ष — सिस्टम पर सवाल, सेहत पर खतरा


मथुरा में नकली DEW फैक्ट्री का पकड़ा जाना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमजोरी को उजागर करता है।

जब तक—


सख्त निगरानी


नियमित जांच


कठोर कार्रवाई



नहीं होती, तब तक ऐसे मिलावटखोर मासूम लोगों की सेहत से खिलवाड़ करते रहेंगे।




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